शहर की शाम

दिसम्बर 22, 2009

उस शहर की शाम में अब रंग उस तरह नहीं दिखते दोस्त
जैसे साथ बीती लंबी, लेकिन छोटी लगती शामों के होते थे
बड़े दिनों बाद फिर से तुम्हारे शहर में जाकर मैं उन रस्तों पर कल शाम को भटकता रहा
रस्ते और मोड़ वही हैं कुछ दरख्त और हवाएं बदली हैं शहर की लेकिन
शिद्‌दत से खोजने पर भी उन चार पैरों के निशां नहीं मिले
मैने हवा से तेरे नए शहर की तरफ एक उम्मीद भेजी
उसने हंसते हुए तेरी हंसी की खनक दे दी मुझ तक
इस उदास शहर में दोस्त, कल कुछ पल के लिये शाम सालों पीछे चली गई

दिसम्बर 17, 2009

छत्तीस सालों का सामाजिक बदलावइन दिनों यूं भी खबरों को पढ़कर किसी को सुकून कहां मिलता है। एक बार कहीं पढ़ा था कि खराब खबरों से तंग आ कर यूरोप के किसी मुल्क में कोरा अखबार छपना शुरू हो गया था। खैर अपने यहां ऐसा नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। खबर अगर आती है तो उसका असर भी होना ही चाहिए। यही खबर की ताकत है। आज दो खबरें पढ़ीं। दोनो को ही पढ कर मन खराब सा हो गया। पहली खबर गुलाबी नगरी की थी।वहां एक युवती ने ब्लैकमेलिंग से तंग आकर जान दे दी। बताया जा रहा है कि उसके अश्लील फोटो खींचकर उसे परेशान fd;k tk रहा था। युवती ने तंग आकर गांधीनगर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे छलांग लगाकर जान दे दी। युवती ने एक सुसाइड नोट छोड़ा है। उसने अपनी मौत का जिम्मेदार युवक को ठहराया है। जिस समाचार चैनल पर यह खबर दिखाई जा रही थी उसके मुताबिक उस युवती ने कुछ ही दिन पहलेs थाने में कथित आरोपी के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज करवाया था। उस वक्त पुलिस ने उसे शांति भंग करने के आरोप में गिरफ्तार किया और बाद में रिहा कर दिया।
युवती के भाई ने बताया कि आरोपी लगातार उसकी बहन को परेशान कर रहा था। पुलिस में भी शिकायत का कोई असर न होने पर उसने जान दे दी।
दूसरी खबर इच्छामृत्यु के मामले से जुड़ी है। एक पत्रकार द्वारा अरूणा नामक एक महिला के मामले में यह अपील की गई थी। खबर के मुताबिक अरूणा अपनी इस अवस्था से पहले एक नर्स थीं। 27 नवंबर 1973 इस महिला के साथ अस्पताल के सफ़ाई कर्मचारी ने बलात्कार किया था। उसके बाद उसे पक्षघात हो गया था। पिछले ३६ सालों से अरूणा इसी हालत में हैं। इस मामले में आरोपी को सात साल की कैद की सजा हुई थी। पिंकी विरानी नामक पत्रकार ने यह याचिका दायर की है। पिंकी ने अरूणा पर एक किताब भी लिखी है। खबर के अनुसाल अरूणा के माता पिता का सालों पहले देहांत हो चुका है और पिछले ३६ सालों में किसी रिश्तेदार ने उनकी कोई सुध नहीं ली है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बलात्कार की घटना के बाद से अरूणा के दिमाग में गहरी चोट आई थी और जिसके कारण वह कुछ भी करने में पूरी तरह से असमर्थ हो गई। वह न ठीक से देख पाती है न सुन पाती है। उसे खाना भी गूंथ कर दिया जाता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जिस हाल में अरूणा आज हैं वो कहीं से भी सम्मानयोग्य नहीं है। याचिका में तमाम तर्क दिए गए होंगे। अब इस से नई बहस छिड़ने की संभावनाएं निकल आतीं हैं।
दोनों खबरों का एक दूसरे से सीधा कोई ताल्लुक तो नहीं है लेकिन एक बाद सामान्य है कि अब ३६ साल पहले भी हमारा समाज औरतों के मामले में कितना संवेदनाहीन था। एक खुशहाल नर्स जो यकीनन कभी हंसकर जिंदगी गुजार रही होगी उसे बलात्कार के बाद इस हाल में पहुंचा दिया गया जहां वो खुद के लिए मौत भी नहीं मांग सकती। आरोपी महज सात सालों में सलाखों से बाहर आ गया।दूसरे मामले में एक नौजवान युवती ने तंग आकर रेलगाड़ी से कटकर आत्महत्या कर दी। यकीनन उसकी जिंदगी भी खुशियों के साथ बीत रही होगी। उसने परेशान होकर मामले में कथित आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी की थी लेकिन पुलिस ने आरोपी को जल्द ही छोड दिया। नतीजा अब सामने है। अपने पीछे छोड़े गए नोट में युवती ने अपना दर्द लिखा है।अरूणा के मामले में अब हम खेद ही व्यक्त कर सकते हैं। इस नये मामले में अब जो भी होगा वो भी कुछ ही दिनों में और खबरों की सुर्खियों के पीछे खो जाएगा। युवती के परिजन शायद ही इसे ताउम्र भुला सकेंगे। लेकिन क्या सही में हमारा समाज इन ३६ सालों में इतना भी सभ्य नहीं हो सका कि एक और आजाद मुल्क में खुशियों भरा जीवन जी सके।

कानून औरतों को जो सुरक्षा दे सकता है वो काफी है या नाकाफी लेकिन क्या हमारा समाज औरतों को सामाजिक सुरक्षा भी नहीं दे सकता। कब औरतें अपने सहकर्मियों , दोस्तों, जानने वालोंके बीच खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर सकेंगी। इसका जवाब भी तलाशना होगा। इसमें कतई देर नहीं करनी चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ियां कहेंगी हमें ऐसी सभ्यता पर कतई नाज नहीं हो सकता जिसमें ३६ सालों में भी आधी दुनिया को इस तरह का शिकार होना पड़ता है

आभासी दुनिया में उलझता बचपन

दिसम्बर 3, 2009

आभासी दुनिया में उलझता बचपन

                                                                                    इंटरनेट का जिन्न वाकई करिश्माई है। आपकी मंशा के मुताबिक आपको चुटकी में सारी सूचना इंटरनेट दे सकता है। आज आपको गोवा छुट्टियां मनाने जाना है, तो इंटरनेट की मदद से रेल के टिकट खरीदने से लेकर होटल में बुकिंगआभासी दुनिया में उलझता बचपन इंटरनेट का जिन्न वाकई करिश्माई है। आपकी मंशा के मुताबिक आपको चुटकी में सारी सूचना इंटरनेट दे सकता है। आज आपको गोवा छुट्टियां मनाने जाना है, तो इंटरनेट की मदद से रेल के टिकट खरीदने से लेकर होटल में बुकिंग कराने तक की पूरी प्रक्रिया पूर्ण हो सकती है,कोई घर या कार खरीदना है तो भी इंटरनेट हाजिर है कहीं भी एक कोने में बैठकर दुनिया के किसी भी द्राहर में खरीददारी कर सकते हैं। किताब पढ़ने का शौक रखते हैं तो अनगिनत ऑनलाइन लाइब्रेरी एक क्लिक पर मौजूद हैं। आपको कहीं नौकरी के लिए आवेदन करना है तो ईमेल से अपना आवेदन भेज सकते हैं, नौकरी खोज सकते हैं, कंपनियों से सीधे संपर्क साध सकते हैं, कई परीक्षाएं तो ऑनलाइन ही हो रही हैं। इस तरह इंटरनेट हमारी जिंदगियों का अहम हिस्सा हो गया है। अपनी आहट के साथ हिंदुस्तान में इंटरनेट ने हर किसी को एक नई दुनिया में दाखिल करवा दिया। लोग इस अंजानी दुनिया में अपने लिए खोज करने लगे। आज किताबों से फैशन और बाजार तक, फिल्मों से लेकर पूरे संसार तक आपकी पहुंच बस एक आसान क्लिक पर हो जाती है। ये इंटरनेट का ही जादुई असर है। कुछ ही दिनों बाद लोग आपस में जुड़ना शुरू हुए। वर्चुअल फ्रैंडच्चिप होने लगीं, लोगों ने ऑनलाइन शादियां तक कर डालीं। दोस्ती के बहाने लोगों ने अपने जैसे लोगों को खोजना शुरू कर दिया,दोस्तों की फेहरिस्त लंबी और लंबी होती चलीं गई। कुछ दिनों बाद कम्युनिटीज बनने लगीं, फिर सोशल नेटवर्किंग का दौर आ गया, हर कोई जो भी इंटरनेट का इस्तेमाल जानता है किसी न किसी सोशल नेटवर्क से जुड़ा है। इंटरनेट की दुनिया में सब कुछ एकदम असली सा लगता है,ऐसा जब तक होता है तब तक बड़ा अच्छा लगता है। इस दुनिया में अधिकतर अभासी ही होता है खासकर दोस्ती या निजी रिश्तों में। एक अंजानी सी अजनबी दुनिया में आप दोस्तों के साथ खो जाते हैं सब अच्छा लग रहा होता है। दूर दुनिया के किसी कोने में जहां आप कभी गए नहीं वहां आपकी किसी से दोस्ती हो जाती है,आभासी बातें होती हैं,सब आपकी उम्मीद से भी अच्छा चल रहा होता है लेकिन कभी आपको पता चलता है कि जो था उसकी हकीकत कुछ है ही नहीं। आप ठगा सा महसूस करते हैं। ऐसे दौर में सच बड़ा मुश्किल सा होता है। इस हकीकत के लिए हम मानसिक तौर पर तैयार ही नहीं होते। आभासों की इस दुनिया का हमारे बच्चों पर क्या असर हो रहा है इसे सोचना जानना भी जरूरी है। दोस्ती कोई बुरी बात तो कतई नहीं है कैसी भी हो, लेकिन अगर एक ऐसी दुनिया में जिसमें कोई आपसे हमेशा अच्छी बातें करता हो] आपसे गहरे तक जुड़ गया हो और एक रोज अचानक लापता हो जाए या आपकी किसी बात का जवाब ही न दे। तो किशोर मन पर क्या असर होगा। हमारे बच्चों को नई तकनीकें और इंटरनेट कितना अकेला बना रहें हैं इस बात पर एक गहरे और गंभीर अध्ययन की जरूरत है। अभी इंटरनेट सोसाइटी का विचार हमारे यहां ज्यादा पुराना नहीं हुआ,लेकिन इसके छोटे छोटे परिणाम हमारी रोजाना की जिंदगी में यूं ही दिखाई दे सकते हैं। स्कूल जाते छोटे छोटे बच्चे रास्ते भर मोबाइल पर बतियाते रहते हैं,खाली समय में मोबाइल पर गेम्स खेलते हैं और बाकी बचे समय में उसी मोबाइल पर गीत संगीत सुना करते हैं या वीडियो देखा करते हैं। यही आलम घरों में भी होता है। आपके घर में इंटरनेट कनेक्शन मौजूद हो तो बच्चे इंटरनेट सर्फ करते मिलेंगे। इंटरनेट की दुनिया इतनी गहरी है कि एक बार उसमें घुसने के बाद आप डूबते चले जाते हैं, सूचनाओं और सामाग्री के अथाह सागर में कोई भी आसानी से भटक सकता है। आलम ये है कि नन्हे बच्चे जिनको इस दुनिया को समझने की जरूरत है वे भी इस आभासी दुनिया में दोस्त तलाश कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले एक अखबार में पढ़ा थाकुछ बच्चों से बातचीत पर पता चला कि इंटरनेट की दुनिया में उनके बहुत से दोस्त हैं। एक बच्चे के तो तकरीबन साढ़े छः सौ दोस्त थे। आभासी दुनिया में किस तरह हमारे मुल्क का बचपन खोता जा रहा है। एक तो लगातार बढ़ रहे अपराधों ने बच्चों के और खुद हमारे भीतर भी गहरा असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है। हमारा डर इस कदर हावी है कि बच्चों को घर की चारदीवारों के भीतर ही खेलने को कहते हैं,बाहर कभी जाने भी दें तो हजारों हिदायतों के साथ और उस पर भी घड़ी की सुईयों की रफतार के साथ साथ हमारी चिंताएं भी बढ ती रहती हैं। हमने घरों की दीवारें और ऊंची करवा दी हैं। सचमुच की दुनिया से खुद हमने दूरिया बना ली हैं। बच्चों को हम दुनिया दिखाने से डरने लगे हैं ऐसे में हमने एक ऐसी दुनिया का दरवाजा उनके लिए खोल दिया है जिसमें सच और झूठ का अंतर पता करना असंभव है। हमारे बच्चे जिसे सच समझ बैठे हैं और लंबे समय तक समझते रहें और किसी रोज उनका वास्ता हकीकत से हो जाए तो जाहिर है कि उसका असर भी नकारात्मक ही होगा। सूचना तकनीक ने हमारी दुनिया को अकेला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसने एक नई दुनिया में सबको अपना निजी कोना मुहैया करवा दिया। उसी कोने में लोग खुद को तलाश रहे हैं। बच्चों के मामले में भी यही हुआ। सूचना तकनीक ने हमारे बच्चों को एकाकी सा बना दिया है। कई मरतबा बच्चे मोबाइल पर अपने दोस्तों से बात करते हुए या कोई गेम खेलते वक्त अपने मां बाप की किसी महत्वपूर्ण बात को अनसुना कर देते हैं। इंटरनेट पर चैट करते वक्त अगर बच्चे को किसी काम के लिए कहा जाए तो वे गुस्सा हो जाते हैं। ये सब अभासी सुंदर दुनिया का असर है कि बच्चों को बिस्तर पर किताब पकड ते ही नींद आने लगती है लेकिन इंटरनेट पर सर्फ करते करते वे देर रात तक जागा करते हैं। मां बाप को पता ही नहीं होता कि बच्चा वाकई कर क्या रहा है। तकरीबन दो तीन साल पहले चीन की एक खबर अखबार में पढ़ी थी कि वहां कई बच्चे नेट के इतने आदी हो गए कि साइबर कैफे में बिल देने के लिए जब उनके पास पैसे नहीं रहे तो उन्होंने अपने घरों के सामान बेचने शुरू कर दिए थे। बहरहाल हिंदुस्तान में ऐसे मामले उजागर नहीं हुए लेकिन हमारे बच्चे बल्कि समाज नेटीजनशिप की आभासी दुनिया का शिकार न हो इसके लिए थोड़ी बहुत सर्तकता होना जरूरी है। सही है कि इस क्रांति ने ज्ञान के सारे दरावजे आपके लिए आपके घर में ही खोल दिए हैं लेकिन इसके कई पहलुओं पर गौर करना भी बेहद जरूरी है। नेट पर आपको क्या सूचना चाहिए आपको पता होना चाहिए,एक अक्षर के बदलने से भी पूरी की पूरी ही सूचना बदल जाती है। आपके बच्चे मोबाइल पर बातचीत करते कितना समय गुजारते हैं, उनके मोबाइल में क्या वीडियो हैं, वे इंटरनेट पर क्या खंगालते रहते हैं, इंटरनेट पर कितनी रात तक बैठे रहते हैं इन सब बारीक बातों पर गौर फरमाना जरूरी है। इंटरनेट की पहुंच उन तक आवश्यक है लेकिन वे अक्सर उस पर अकेले काम न करें, सचमुच की दुनिया के दोस्तों से भी बातचीत करें,मोबाइल गेम्स तक ही सीमित न रहें इनडोर या आउटडोर गेम्स भी खेलें। मां बाप भी उन्हें समय दें, उनसे बातचीत करें,किस्से कहानियां सुनाएं उन्हें घुमाने ले जाएं। अपने बच्चों को और खुद को भी एकाकी न होने दें। दुनिया वाकई खूबसूरत है,हमारे इर्द गिर्द ही अच्छे लोग बसर करते हैं जरूरत हाथ बढ़ाने भर की है। हमें बच्चों को यही बात सिखाने की आवश्यकता है। थोड़ा इस ओर ध्यान देने की जरूरत है कि हमारे बच्चे सूचना संचार की आभासी दुनिया में ही उलझ कर न रह जाएं। कराने तक की पूरी प्रक्रिया पूर्ण हो सकती है,कोई घर या कार खरीदना है तो भी इंटरनेट हाजिर है कहीं भी एक कोने में बैठकर दुनिया के किसी भी द्राहर में खरीददारी कर सकते हैं। किताब पढ़ने का शौक रखते हैं तो अनगिनत ऑनलाइन लाइब्रेरी एक क्लिक पर मौजूद हैं। आपको कहीं नौकरी के लिए आवेदन करना है तो ईमेल से अपना आवेदन भेज सकते हैं, नौकरी खोज सकते हैं, कंपनियों से सीधे संपर्क साध सकते हैं, कई परीक्षाएं तो ऑनलाइन ही हो रही हैं। इस तरह इंटरनेट हमारी जिंदगियों का अहम हिस्सा हो गया है। अपनी आहट के साथ हिंदुस्तान में इंटरनेट ने हर किसी को एक नई दुनिया में दाखिल करवा दिया। लोग इस अंजानी दुनिया में अपने लिए खोज करने लगे। आज किताबों से फैशन और बाजार तक, फिल्मों से लेकर पूरे संसार तक आपकी पहुंच बस एक आसान क्लिक पर हो जाती है। ये इंटरनेट का ही जादुई असर है। कुछ ही दिनों बाद लोग आपस में जुड़ना शुरू हुए। वर्चुअल फ्रैंडच्चिप होने लगीं, लोगों ने ऑनलाइन शादियां तक कर डालीं। दोस्ती के बहाने लोगों ने अपने जैसे लोगों को खोजना शुरू कर दिया,दोस्तों की फेहरिस्त लंबी और लंबी होती चलीं गई। कुछ दिनों बाद कम्युनिटीज बनने लगीं, फिर सोशल नेटवर्किंग का दौर आ गया, हर कोई जो भी इंटरनेट का इस्तेमाल जानता है किसी न किसी सोशल नेटवर्क से जुड़ा है। इंटरनेट की दुनिया में सब कुछ एकदम असली सा लगता है,ऐसा जब तक होता है तब तक बड़ा अच्छा लगता है।

                                      इस दुनिया में अधिकतर अभासी ही होता है खासकर दोस्ती या निजी रिश्तों में। एक अंजानी सी अजनबी दुनिया में आप दोस्तों के साथ खो जाते हैं सब अच्छा लग रहा होता है। दूर दुनिया के किसी कोने में जहां आप कभी गए नहीं वहां आपकी किसी से दोस्ती हो जाती है,आभासी बातें होती हैं,सब आपकी उम्मीद से भी अच्छा चल रहा होता है लेकिन कभी आपको पता चलता है कि जो था उसकी हकीकत कुछ है ही नहीं। आप ठगा सा महसूस करते हैं। ऐसे दौर में सच बड़ा मुश्किल सा होता है। इस हकीकत के लिए हम मानसिक तौर पर तैयार ही नहीं होते। आभासों की इस दुनिया का हमारे बच्चों पर क्या असर हो रहा है इसे सोचना जानना भी जरूरी है। दोस्ती कोई बुरी बात तो कतई नहीं है कैसी भी हो, लेकिन अगर एक ऐसी दुनिया में जिसमें कोई आपसे हमेशा अच्छी बातें करता हो] आपसे गहरे तक जुड़ गया हो और एक रोज अचानक लापता हो जाए या आपकी किसी बात का जवाब ही न दे। तो किशोर मन पर क्या असर होगा। हमारे बच्चों को नई तकनीकें और इंटरनेट कितना अकेला बना रहें हैं इस बात पर एक गहरे और गंभीर अध्ययन की जरूरत है। अभी इंटरनेट सोसाइटी का विचार हमारे यहां ज्यादा पुराना नहीं हुआ,लेकिन इसके छोटे छोटे परिणाम हमारी रोजाना की जिंदगी में यूं ही दिखाई दे सकते हैं। स्कूल जाते छोटे छोटे बच्चे रास्ते भर मोबाइल पर बतियाते रहते हैं,खाली समय में मोबाइल पर गेम्स खेलते हैं और बाकी बचे समय में उसी मोबाइल पर गीत संगीत सुना करते हैं या वीडियो देखा करते हैं। यही आलम घरों में भी होता है। आपके घर में इंटरनेट कनेक्शन मौजूद हो तो बच्चे इंटरनेट सर्फ करते मिलेंगे। इंटरनेट की दुनिया इतनी गहरी है कि एक बार उसमें घुसने के बाद आप डूबते चले जाते हैं, सूचनाओं और सामाग्री के अथाह सागर में कोई भी आसानी से भटक सकता है।

                       आलम ये है कि नन्हे बच्चे जिनको इस दुनिया को समझने की जरूरत है वे भी इस आभासी दुनिया में दोस्त तलाश कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले एक अखबार में पढ़ा थाकुछ बच्चों से बातचीत पर पता चला कि इंटरनेट की दुनिया में उनके बहुत से दोस्त हैं। एक बच्चे के तो तकरीबन साढ़े छः सौ दोस्त थे। आभासी दुनिया में किस तरह हमारे मुल्क का बचपन खोता जा रहा है। एक तो लगातार बढ़ रहे अपराधों ने बच्चों के और खुद हमारे भीतर भी गहरा असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है। हमारा डर इस कदर हावी है कि बच्चों को घर की चारदीवारों के भीतर ही खेलने को कहते हैं,बाहर कभी जाने भी दें तो हजारों हिदायतों के साथ और उस पर भी घड़ी की सुईयों की रफतार के साथ साथ हमारी चिंताएं भी बढ ती रहती हैं। हमने घरों की दीवारें और ऊंची करवा दी हैं। सचमुच की दुनिया से खुद हमने दूरिया बना ली हैं। बच्चों को हम दुनिया दिखाने से डरने लगे हैं ऐसे में हमने एक ऐसी दुनिया का दरवाजा उनके लिए खोल दिया है जिसमें सच और झूठ का अंतर पता करना असंभव है। हमारे बच्चे जिसे सच समझ बैठे हैं और लंबे समय तक समझते रहें और किसी रोज उनका वास्ता हकीकत से हो जाए तो जाहिर है कि उसका असर भी नकारात्मक ही होगा। सूचना तकनीक ने हमारी दुनिया को अकेला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसने एक नई दुनिया में सबको अपना निजी कोना मुहैया करवा दिया। उसी कोने में लोग खुद को तलाश रहे हैं। बच्चों के मामले में भी यही हुआ। सूचना तकनीक ने हमारे बच्चों को एकाकी सा बना दिया है। कई मरतबा बच्चे मोबाइल पर अपने दोस्तों से बात करते हुए या कोई गेम खेलते वक्त अपने मां बाप की किसी महत्वपूर्ण बात को अनसुना कर देते हैं। इंटरनेट पर चैट करते वक्त अगर बच्चे को किसी काम के लिए कहा जाए तो वे गुस्सा हो जाते हैं। ये सब अभासी सुंदर दुनिया का असर है कि बच्चों को बिस्तर पर किताब पकड ते ही नींद आने लगती है लेकिन इंटरनेट पर सर्फ करते करते वे देर रात तक जागा करते हैं। मां बाप को पता ही नहीं होता कि बच्चा वाकई कर क्या रहा है। तकरीबन दो तीन साल पहले चीन की एक खबर अखबार में पढ़ी थी कि वहां कई बच्चे नेट के इतने आदी हो गए कि साइबर कैफे में बिल देने के लिए जब उनके पास पैसे नहीं रहे तो उन्होंने अपने घरों के सामान बेचने शुरू कर दिए थे। बहरहाल हिंदुस्तान में ऐसे मामले उजागर नहीं हुए लेकिन हमारे बच्चे बल्कि समाज नेटीजनशिप की आभासी दुनिया का शिकार न हो इसके लिए थोड़ी बहुत सर्तकता होना जरूरी है।

                           सही है कि इस क्रांति ने ज्ञान के सारे दरावजे आपके लिए आपके घर में ही खोल दिए हैं लेकिन इसके कई पहलुओं पर गौर करना भी बेहद जरूरी है। नेट पर आपको क्या सूचना चाहिए आपको पता होना चाहिए,एक अक्षर के बदलने से भी पूरी की पूरी ही सूचना बदल जाती है। आपके बच्चे मोबाइल पर बातचीत करते कितना समय गुजारते हैं, उनके मोबाइल में क्या वीडियो हैं, वे इंटरनेट पर क्या खंगालते रहते हैं, इंटरनेट पर कितनी रात तक बैठे रहते हैं इन सब बारीक बातों पर गौर फरमाना जरूरी है। इंटरनेट की पहुंच उन तक आवश्यक है लेकिन वे अक्सर उस पर अकेले काम न करें, सचमुच की दुनिया के दोस्तों से भी बातचीत करें,मोबाइल गेम्स तक ही सीमित न रहें इनडोर या आउटडोर गेम्स भी खेलें। मां बाप भी उन्हें समय दें, उनसे बातचीत करें,किस्से कहानियां सुनाएं उन्हें घुमाने ले जाएं। अपने बच्चों को और खुद को भी एकाकी न होने दें। दुनिया वाकई खूबसूरत है,हमारे इर्द गिर्द ही अच्छे लोग बसर करते हैं जरूरत हाथ बढ़ाने भर की है। हमें बच्चों को यही बात सिखाने की आवश्यकता है। थोड़ा इस ओर ध्यान देने की जरूरत है कि हमारे बच्चे सूचना संचार की आभासी दुनिया में ही उलझ कर न रह जाएं।

आभासी दुनिया में उलझता बचपन

                                                                                    इंटरनेट का जिन्न वाकई करिश्माई है। आपकी मंशा के मुताबिक आपको चुटकी में सारी सूचना इंटरनेट दे सकता है। आज आपको गोवा छुट्टियां मनाने जाना है, तो इंटरनेट की मदद से रेल के टिकट खरीदने से लेकर होटल में बुकिंग कराने तक की पूरी प्रक्रिया पूर्ण हो सकती है,कोई घर या कार खरीदना है तो भी इंटरनेट हाजिर है कहीं भी एक कोने में बैठकर दुनिया के किसी भी द्राहर में खरीददारी कर सकते हैं। किताब पढ़ने का शौक रखते हैं तो अनगिनत ऑनलाइन लाइब्रेरी एक क्लिक पर मौजूद हैं। आपको कहीं नौकरी के लिए आवेदन करना है तो ईमेल से अपना आवेदन भेज सकते हैं, नौकरी खोज सकते हैं, कंपनियों से सीधे संपर्क साध सकते हैं, कई परीक्षाएं तो ऑनलाइन ही हो रही हैं। इस तरह इंटरनेट हमारी जिंदगियों का अहम हिस्सा हो गया है। अपनी आहट के साथ हिंदुस्तान में इंटरनेट ने हर किसी को एक नई दुनिया में दाखिल करवा दिया। लोग इस अंजानी दुनिया में अपने लिए खोज करने लगे। आज किताबों से फैशन और बाजार तक, फिल्मों से लेकर पूरे संसार तक आपकी पहुंच बस एक आसान क्लिक पर हो जाती है। ये इंटरनेट का ही जादुई असर है। कुछ ही दिनों बाद लोग आपस में जुड़ना शुरू हुए। वर्चुअल फ्रैंडच्चिप होने लगीं, लोगों ने ऑनलाइन शादियां तक कर डालीं। दोस्ती के बहाने लोगों ने अपने जैसे लोगों को खोजना शुरू कर दिया,दोस्तों की फेहरिस्त लंबी और लंबी होती चलीं गई। कुछ दिनों बाद कम्युनिटीज बनने लगीं, फिर सोशल नेटवर्किंग का दौर आ गया, हर कोई जो भी इंटरनेट का इस्तेमाल जानता है किसी न किसी सोशल नेटवर्क से जुड़ा है। इंटरनेट की दुनिया में सब कुछ एकदम असली सा लगता है,ऐसा जब तक होता है तब तक बड़ा अच्छा लगता है।

                                      इस दुनिया में अधिकतर अभासी ही होता है खासकर दोस्ती या निजी रिश्तों में। एक अंजानी सी अजनबी दुनिया में आप दोस्तों के साथ खो जाते हैं सब अच्छा लग रहा होता है। दूर दुनिया के किसी कोने में जहां आप कभी गए नहीं वहां आपकी किसी से दोस्ती हो जाती है,आभासी बातें होती हैं,सब आपकी उम्मीद से भी अच्छा चल रहा होता है लेकिन कभी आपको पता चलता है कि जो था उसकी हकीकत कुछ है ही नहीं। आप ठगा सा महसूस करते हैं। ऐसे दौर में सच बड़ा मुश्किल सा होता है। इस हकीकत के लिए हम मानसिक तौर पर तैयार ही नहीं होते। आभासों की इस दुनिया का हमारे बच्चों पर क्या असर हो रहा है इसे सोचना जानना भी जरूरी है। दोस्ती कोई बुरी बात तो कतई नहीं है कैसी भी हो, लेकिन अगर एक ऐसी दुनिया में जिसमें कोई आपसे हमेशा अच्छी बातें करता हो] आपसे गहरे तक जुड़ गया हो और एक रोज अचानक लापता हो जाए या आपकी किसी बात का जवाब ही न दे। तो किशोर मन पर क्या असर होगा। हमारे बच्चों को नई तकनीकें और इंटरनेट कितना अकेला बना रहें हैं इस बात पर एक गहरे और गंभीर अध्ययन की जरूरत है। अभी इंटरनेट सोसाइटी का विचार हमारे यहां ज्यादा पुराना नहीं हुआ,लेकिन इसके छोटे छोटे परिणाम हमारी रोजाना की जिंदगी में यूं ही दिखाई दे सकते हैं। स्कूल जाते छोटे छोटे बच्चे रास्ते भर मोबाइल पर बतियाते रहते हैं,खाली समय में मोबाइल पर गेम्स खेलते हैं और बाकी बचे समय में उसी मोबाइल पर गीत संगीत सुना करते हैं या वीडियो देखा करते हैं। यही आलम घरों में भी होता है। आपके घर में इंटरनेट कनेक्शन मौजूद हो तो बच्चे इंटरनेट सर्फ करते मिलेंगे। इंटरनेट की दुनिया इतनी गहरी है कि एक बार उसमें घुसने के बाद आप डूबते चले जाते हैं, सूचनाओं और सामाग्री के अथाह सागर में कोई भी आसानी से भटक सकता है।

                       आलम ये है कि नन्हे बच्चे जिनको इस दुनिया को समझने की जरूरत है वे भी इस आभासी दुनिया में दोस्त तलाश कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले एक अखबार में पढ़ा थाकुछ बच्चों से बातचीत पर पता चला कि इंटरनेट की दुनिया में उनके बहुत से दोस्त हैं। एक बच्चे के तो तकरीबन साढ़े छः सौ दोस्त थे। आभासी दुनिया में किस तरह हमारे मुल्क का बचपन खोता जा रहा है। एक तो लगातार बढ़ रहे अपराधों ने बच्चों के और खुद हमारे भीतर भी गहरा असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है। हमारा डर इस कदर हावी है कि बच्चों को घर की चारदीवारों के भीतर ही खेलने को कहते हैं,बाहर कभी जाने भी दें तो हजारों हिदायतों के साथ और उस पर भी घड़ी की सुईयों की रफतार के साथ साथ हमारी चिंताएं भी बढ ती रहती हैं। हमने घरों की दीवारें और ऊंची करवा दी हैं। सचमुच की दुनिया से खुद हमने दूरिया बना ली हैं। बच्चों को हम दुनिया दिखाने से डरने लगे हैं ऐसे में हमने एक ऐसी दुनिया का दरवाजा उनके लिए खोल दिया है जिसमें सच और झूठ का अंतर पता करना असंभव है। हमारे बच्चे जिसे सच समझ बैठे हैं और लंबे समय तक समझते रहें और किसी रोज उनका वास्ता हकीकत से हो जाए तो जाहिर है कि उसका असर भी नकारात्मक ही होगा। सूचना तकनीक ने हमारी दुनिया को अकेला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसने एक नई दुनिया में सबको अपना निजी कोना मुहैया करवा दिया। उसी कोने में लोग खुद को तलाश रहे हैं। बच्चों के मामले में भी यही हुआ। सूचना तकनीक ने हमारे बच्चों को एकाकी सा बना दिया है। कई मरतबा बच्चे मोबाइल पर अपने दोस्तों से बात करते हुए या कोई गेम खेलते वक्त अपने मां बाप की किसी महत्वपूर्ण बात को अनसुना कर देते हैं। इंटरनेट पर चैट करते वक्त अगर बच्चे को किसी काम के लिए कहा जाए तो वे गुस्सा हो जाते हैं। ये सब अभासी सुंदर दुनिया का असर है कि बच्चों को बिस्तर पर किताब पकड ते ही नींद आने लगती है लेकिन इंटरनेट पर सर्फ करते करते वे देर रात तक जागा करते हैं। मां बाप को पता ही नहीं होता कि बच्चा वाकई कर क्या रहा है। तकरीबन दो तीन साल पहले चीन की एक खबर अखबार में पढ़ी थी कि वहां कई बच्चे नेट के इतने आदी हो गए कि साइबर कैफे में बिल देने के लिए जब उनके पास पैसे नहीं रहे तो उन्होंने अपने घरों के सामान बेचने शुरू कर दिए थे। बहरहाल हिंदुस्तान में ऐसे मामले उजागर नहीं हुए लेकिन हमारे बच्चे बल्कि समाज नेटीजनशिप की आभासी दुनिया का शिकार न हो इसके लिए थोड़ी बहुत सर्तकता होना जरूरी है।

                           सही है कि इस क्रांति ने ज्ञान के सारे दरावजे आपके लिए आपके घर में ही खोल दिए हैं लेकिन इसके कई पहलुओं पर गौर करना भी बेहद जरूरी है। नेट पर आपको क्या सूचना चाहिए आपको पता होना चाहिए,एक अक्षर के बदलने से भी पूरी की पूरी ही सूचना बदल जाती है। आपके बच्चे मोबाइल पर बातचीत करते कितना समय गुजारते हैं, उनके मोबाइल में क्या वीडियो हैं, वे इंटरनेट पर क्या खंगालते रहते हैं, इंटरनेट पर कितनी रात तक बैठे रहते हैं इन सब बारीक बातों पर गौर फरमाना जरूरी है। इंटरनेट की पहुंच उन तक आवश्यक है लेकिन वे अक्सर उस पर अकेले काम न करें, सचमुच की दुनिया के दोस्तों से भी बातचीत करें,मोबाइल गेम्स तक ही सीमित न रहें इनडोर या आउटडोर गेम्स भी खेलें। मां बाप भी उन्हें समय दें, उनसे बातचीत करें,किस्से कहानियां सुनाएं उन्हें घुमाने ले जाएं। अपने बच्चों को और खुद को भी एकाकी न होने दें। दुनिया वाकई खूबसूरत है,हमारे इर्द गिर्द ही अच्छे लोग बसर करते हैं जरूरत हाथ बढ़ाने भर की है। हमें बच्चों को यही बात सिखाने की आवश्यकता है। थोड़ा इस ओर ध्यान देने की जरूरत है कि हमारे बच्चे सूचना संचार की आभासी दुनिया में ही उलझ कर न रह जाएं।

छोकरी के कदम

नवम्बर 26, 2009

कहीं अब भी किसी छोकरी के कदम हजार नजरों का शिकार बनते हैं

 कि लगातार शिकार बनते हुए भी हिम्मत के साथ आगे हुए बढ़ते हैं

तब तलक कि जब तक छोकरी ही शिकार न हो जाती है उस जगह

कमाल है कि गहरे डर के बावजूद छोकरी निडर बढ ती रहती है और

अगर वो छोकरी तमाम शिकार हो भी जाती है तो उसका असर देखो

 कहीं दूसरी जगह, कोई दूसरी छोकरी पूरी हिम्मत से कदम बढाती है


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