छत्तीस सालों का सामाजिक बदलावइन दिनों यूं भी खबरों को पढ़कर किसी को सुकून कहां मिलता है। एक बार कहीं पढ़ा था कि खराब खबरों से तंग आ कर यूरोप के किसी मुल्क में कोरा अखबार छपना शुरू हो गया था। खैर अपने यहां ऐसा नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। खबर अगर आती है तो उसका असर भी होना ही चाहिए। यही खबर की ताकत है। आज दो खबरें पढ़ीं। दोनो को ही पढ कर मन खराब सा हो गया। पहली खबर गुलाबी नगरी की थी।वहां एक युवती ने ब्लैकमेलिंग से तंग आकर जान दे दी। बताया जा रहा है कि उसके अश्लील फोटो खींचकर उसे परेशान fd;k tk रहा था। युवती ने तंग आकर गांधीनगर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे छलांग लगाकर जान दे दी। युवती ने एक सुसाइड नोट छोड़ा है। उसने अपनी मौत का जिम्मेदार युवक को ठहराया है। जिस समाचार चैनल पर यह खबर दिखाई जा रही थी उसके मुताबिक उस युवती ने कुछ ही दिन पहलेs थाने में कथित आरोपी के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज करवाया था। उस वक्त पुलिस ने उसे शांति भंग करने के आरोप में गिरफ्तार किया और बाद में रिहा कर दिया।
युवती के भाई ने बताया कि आरोपी लगातार उसकी बहन को परेशान कर रहा था। पुलिस में भी शिकायत का कोई असर न होने पर उसने जान दे दी।
दूसरी खबर इच्छामृत्यु के मामले से जुड़ी है। एक पत्रकार द्वारा अरूणा नामक एक महिला के मामले में यह अपील की गई थी। खबर के मुताबिक अरूणा अपनी इस अवस्था से पहले एक नर्स थीं। 27 नवंबर 1973 इस महिला के साथ अस्पताल के सफ़ाई कर्मचारी ने बलात्कार किया था। उसके बाद उसे पक्षघात हो गया था। पिछले ३६ सालों से अरूणा इसी हालत में हैं। इस मामले में आरोपी को सात साल की कैद की सजा हुई थी। पिंकी विरानी नामक पत्रकार ने यह याचिका दायर की है। पिंकी ने अरूणा पर एक किताब भी लिखी है। खबर के अनुसाल अरूणा के माता पिता का सालों पहले देहांत हो चुका है और पिछले ३६ सालों में किसी रिश्तेदार ने उनकी कोई सुध नहीं ली है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बलात्कार की घटना के बाद से अरूणा के दिमाग में गहरी चोट आई थी और जिसके कारण वह कुछ भी करने में पूरी तरह से असमर्थ हो गई। वह न ठीक से देख पाती है न सुन पाती है। उसे खाना भी गूंथ कर दिया जाता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जिस हाल में अरूणा आज हैं वो कहीं से भी सम्मानयोग्य नहीं है। याचिका में तमाम तर्क दिए गए होंगे। अब इस से नई बहस छिड़ने की संभावनाएं निकल आतीं हैं।
दोनों खबरों का एक दूसरे से सीधा कोई ताल्लुक तो नहीं है लेकिन एक बाद सामान्य है कि अब ३६ साल पहले भी हमारा समाज औरतों के मामले में कितना संवेदनाहीन था। एक खुशहाल नर्स जो यकीनन कभी हंसकर जिंदगी गुजार रही होगी उसे बलात्कार के बाद इस हाल में पहुंचा दिया गया जहां वो खुद के लिए मौत भी नहीं मांग सकती। आरोपी महज सात सालों में सलाखों से बाहर आ गया।दूसरे मामले में एक नौजवान युवती ने तंग आकर रेलगाड़ी से कटकर आत्महत्या कर दी। यकीनन उसकी जिंदगी भी खुशियों के साथ बीत रही होगी। उसने परेशान होकर मामले में कथित आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी की थी लेकिन पुलिस ने आरोपी को जल्द ही छोड दिया। नतीजा अब सामने है। अपने पीछे छोड़े गए नोट में युवती ने अपना दर्द लिखा है।अरूणा के मामले में अब हम खेद ही व्यक्त कर सकते हैं। इस नये मामले में अब जो भी होगा वो भी कुछ ही दिनों में और खबरों की सुर्खियों के पीछे खो जाएगा। युवती के परिजन शायद ही इसे ताउम्र भुला सकेंगे। लेकिन क्या सही में हमारा समाज इन ३६ सालों में इतना भी सभ्य नहीं हो सका कि एक और आजाद मुल्क में खुशियों भरा जीवन जी सके।
कानून औरतों को जो सुरक्षा दे सकता है वो काफी है या नाकाफी लेकिन क्या हमारा समाज औरतों को सामाजिक सुरक्षा भी नहीं दे सकता। कब औरतें अपने सहकर्मियों , दोस्तों, जानने वालोंके बीच खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर सकेंगी। इसका जवाब भी तलाशना होगा। इसमें कतई देर नहीं करनी चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ियां कहेंगी हमें ऐसी सभ्यता पर कतई नाज नहीं हो सकता जिसमें ३६ सालों में भी आधी दुनिया को इस तरह का शिकार होना पड़ता है
दिसम्बर 21, 2009 को 7:47 अपराह्न पर |
sach kaha aapne ….kab tak ? akhir kab tak …