उस शहर की शाम में अब रंग उस तरह नहीं दिखते दोस्त
जैसे साथ बीती लंबी, लेकिन छोटी लगती शामों के होते थे
बड़े दिनों बाद फिर से तुम्हारे शहर में जाकर मैं उन रस्तों पर कल शाम को भटकता रहा
रस्ते और मोड़ वही हैं कुछ दरख्त और हवाएं बदली हैं शहर की लेकिन
शिद्दत से खोजने पर भी उन चार पैरों के निशां नहीं मिले
मैने हवा से तेरे नए शहर की तरफ एक उम्मीद भेजी
उसने हंसते हुए तेरी हंसी की खनक दे दी मुझ तक
इस उदास शहर में दोस्त, कल कुछ पल के लिये शाम सालों पीछे चली गई